SUNDERKAND
सुन्दरकाण्ड
दो. - प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि ।
गएँ सरन प्रभु राख्रिहैं तव अपराध बिसारि ।। 22 ।।
राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राजु तुम्ह करहू ।।
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका । तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका ।।
राम नाम बिनु गिरा न सोहा । देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ।।
बसन हीन नहिं सोह सुरारी । सब भूषन भूषित बर नारी ।।
राम बिमुख संपति प्रभुताई । जाइ रही पाई बिनु पाई ।।
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं । बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाही ।।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी । बिमुख राम त्राता नहिं कोपी ।।
संकर सहस बिष्नु अज तोही । सकहिं न राखि राम कर द्रोही ।।
दो. - मोहमूल बहु सुल प्रद त्यागहु तम अभिमान ।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ।। 23 ।।
जदपि कही कपि अति हित बानी । भगति बिबेक बिरति नय सानी ।।
बोला बिहसि महा अभिमानी । मिला हमलि कपि गुर बड़ ग्यानी ।।
मृत्यु निकट आई खल तोही । लागेसि अधम सिखावन मोही ।।
उलटा होइहि कह हनुमाना । मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ।।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना । बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना ।।
सुनत निसाचर मारन धए । सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए ।।
नाइ सीस करि बिनय बहूता । नीति बिरोध न मारिअ दूता ।।
आन दंड कछु करिअ गोसाँई । सबहीं कहा मंत्रा भल भाई ।।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर । अंग भंग करि पठइअ बंदर ।।
दो. - कपि कें ममता पूँछपर सबहि कहउँ समुझाइ ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ । 24 ।।
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि । तब सठ निज नाथहि लइ आइहि ।।
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई । देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई ।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना । भइ सहाय सारद मैं जाना ।।
जातुधान सुनि रावन बचना।। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना ।।
रहा न नगर बसन घृत तेला । बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला ।।
कौतुक कहँ आए पुरबासी । मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ।।





