शंखनाद
की गूंज कानों में पड़ते ही ऐसा लगता है, जैसे चारों तरफ माहौल भक्तिमय हो जाता है। सफेद रंग के शंख से
निकली ध्वनि मानो प्रकृति हर कोने में गूंज-गूंज कर
यह संदेश देती है कि किसी भी प्रकार की नकारात्नक
ऊर्जा तब तक बलवान नहीं हो सकती है जब तक ब्रह्मांड में शंखनाद का अस्तित्व है।

शंख
समुद्र मंथन से मिले चौदह रत्नों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति छठें स्थान पर हुई थी। हिंदू धर्म में कोई भी पूजा शंख-ध्वनि के बिना अधूरी
मानी जाती है। शंख को माता लक्ष्मी जी का भाई माना जाता है क्योकि मां लक्ष्मी के
समान शंख का जन्म भी सागर की गोद से हुआ है। माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु दोनों
ही अपने हाथों में शंख धारण करते हैं। दक्षिणावर्ती
शंख के अद्भुत गुणों के कारण ही भगवान विष्णु ने उसे अपने हस्तकमल में धारण किया
हुआ है।





शंख
को भले ही बहुत ही पवित्र और रत्नों के समान माना गया हो, लेकिन शिव जी की अराधना में इसे वर्जित माना गया है क्योंकि
शंखनाद की ध्वनि से सभी प्रकार की नकारात्मक और भूत-प्रेत भाग जाते है। जबकि शिवजी
देवताओं की भांति भूतों के भी आराध्य माने गये है।

ऐसे शंख को कभी भी
घर में न रखें जो कहीं से भी टूटा फूटा हो, चटका हो या उसमें दरार हो। यदि उसके किनारे कहीं से भी
चटके हों, तो उन्हें रेतकर ठीक कर लें अन्यथा उसे नदी
या तालाब में प्रवाहित कर दें। अगर शंख बजाते
समय हाथ से छूटकर गिर गया हो, तो भी उसे पूजा में उपयोग ना करें क्योंकि इन्हें खंडित माना जाता है।






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