आपका दिमाग ईश्वर की ओर से दिया गया एक अनमोल तोहफा है, समस्याओं को सुलझाने के लिये आप इसका जमकर लुत्फ उठायें। आपका दिमाग आपका बेहतरीन दोस्त है और अपनी बात समझाने के लिये मैं आपको एक किस्सा सुनाता हूँ



मान लीजिये आप किसी आफिस में इंटरव्यू के लिये जाते हैं। आपको खुद की काबिलियत पर, ज्ञान पर और अपने अनुभव पर पूरा भरोसा है। अपनी बारी आने पर आप साक्षात्कारकर्ता के सामने पूरी तैयारी के साथ पहुंचते है। अभी तक सब कुछ ठीक चल रहा है और आपके दिमाग में लगातार ये उधेड़बुन चल रही है कि साक्षात्कारकर्ता आपसे अगला प्रश्न कौन-सा पूछने वाला है।



आप मन ही मन अपनी एक मजबूत रणनीति बना रहे हैं कि तभी साक्षात्कारकर्ता आपसे बिना कोई प्रश्न पूछे सिर्फ एक लाइन कहता है कि  - “खिड़की खोलो और कूदो”...... आप कैसा महसूस करेंगें ? आपको लगेगा शायद यह व्यक्ति पागल है लेकिन ऐसा नहीं है.......



“खिड़की खोलो और कूदो”...... ये चार शब्द इस बात के लिये बोले गये है कि आप कितनी तेजी से बातों को समझते हैं और किस तरह से स्थिति पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। लेकिन जब तक आप पूरी बात समझ नहीं पाते, तब तक साक्षात्कारकर्ता की मानसिक हालत पर दया आ सकती है या फिर शायद बहुत तेज गुस्सा भी। आपके पास इस बात की इजाज़त नहीं है कि आप साक्षात्कारकर्ता को पलट कर जवाब दे पायें या फिर कुछ पूछ पायें। ऐसी स्थिति में आप क्या करेगें ?



 सबसे जरुरी बात ये है कि आप चीजों को पूरी गहराई से सोचे और समझे। कभी-भी जल्दबाजी में अपना धैर्य न खोये। अगर आपके सामने कभी-भी कठिन परिस्थिति आ जाती है, तो शांति के साथ सोचे और अपने दिमाग का प्रयोग करें।



 अब जरा ध्यान से सोचते है कि साक्षात्कारकर्ता ने क्या कहा “खिड़की खोलो और कूदो” जी हाँ,  बिल्कुल सही कहा आपने। साक्षात्कारकर्ता ने सिर्फ यही कहा है कि “खिड़की खोलो और कूदो” ये नहीं कहा है कि “खिड़की खोलो और बाहर कूदो” यानि आपको सिर्फ “खिड़की खोलनी है और कूदना है” लेकिन “बाहर नहीं कूदना है”। हमें अपनी हड़बड़ी के कारण ऐसा लगता है जैसे हमसे कहा गया है कि खिड़की खोलकर बाहर कूदना है और जब इसी बात को हम शांति से सोचते और समझते है तो हमें महसूस होता है कि हमें सिर्फ खिड़की खोलने और कूदने के लिये कहा गया है।



बस यही बात है कि समस्याएं इतनी जटिल नहीं होती है, जितना उन्हें हम अपनी हड़बड़ी से बना देते हैं।