धर्म और विज्ञान...दो ऐसे शब्द, जिन्हें पूरी तरह से एक-दूसरे का कट्टर प्रतिद्वंदी या यूं कहें कि एक-दूसरे का शत्रु माना गया है। हमारे दिमाग में ये बात बहुत ही गहराई से बैठ गई है कि जहां धर्म, आस्था और विश्वास का “साम्राज्य” होगा, वहां विज्ञान के तर्क-वितर्क, तथ्य और आधार को “घृणित” नजरों से ही देखा जायेगा और जहां विज्ञान का “राज” होगा, वहां धर्म स्वयं को “लाचार” और “अपंग” पायेगा... आखिर ऐसा क्यों है कि धर्म और विज्ञान को लेकर हमारे मस्तिष्क में हमेशा से ही ये उथल-पुथल रही है कि दोनों में से कौन ज्यादा सर्व-शक्तिमान है...धर्म और विज्ञान के बीच किसी एक को चुनने की ये ऊहापोह हमारे दिमाग में लगातार इसलिये बनी रहती है क्योंकि ये दो ऐसे मुख्य आधारबिन्दु है जो मनुष्य के जीवन को जीने के तरीके को निर्धारित करते है।


ये प्रश्न आज या कल का नहीं है बल्कि सदियों से हम सभी के मन में ये लगातार कौंधता रहा है। भारतीय संस्कृति में जीवन जीने के लिये जहां एक तरफ धर्म को ही सिर-आंखो पर बैठाया गया है तो वहीं पश्चिमी संस्कृति में जीवन जीने के लिये विज्ञान पर जोर दिया गया है। धर्म और विज्ञान के बीच खुद को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की कोशिश इस तरह से लगातार चलती रहती है जैसे अनुभव यानी किसी वृद्ध के बीच और नयी तकनीक यानि किसी नौजवान के बीच चलती रहती है। धर्म आस्था, विश्वास, प्रेम और संस्कृति के अनुभवी स्तंभों पर जीवन जीने को श्रेष्ठ मानता है तो विज्ञान हर बात के पीछे तर्क-वितर्क को ज्यादा महत्तव देता है।



लेकिन अगर हम ध्यान से इस बात पर गौर करें कि क्या धर्म और विज्ञान एक-दूसरे के शत्रु है तो आप पायेंगें कि नहीं ऐसा नहीं है। दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। हमारा जीवन तभी श्रेष्ठ बन सकता है जब हम दोनों की तुलना करना बंद करे और दोनों के महत्तव को बराबर समझते हुए दोनों को एक साथ लेकर चले। ये बात बहुत ही सरलता से समझी जा सकती है कि भारतीय संस्कृति स्वंय भी विज्ञान का सम्मान करती है। बस हम कभी इस बात को खुले तौर पर स्वीकार नहीं करते हैं। हम अक्सर बचपन से सुनते आये है कि “अति हर चीज की बुरी होती है” या फिर “सुख-दुख एक ही सिक्के के दो पहलु है” ये ऐसी बाते हैं जो स्वंय में एक गहरा अर्थ लिये हुये है।



अगर बात करें अपनी संस्कृति की तो हम अपनी बाइक, कम्प्यूटर, तराजू, कार, रिक्शा कोई भी चीज जिससे हम अपनी रोजी-रोटी चलाते है, उसके पैर छूते है, उसका सम्मान करते है यानि हम कहीं-न-कहीं उस विज्ञान का सम्मान कर रहे है जिस टेक्नालाजी के द्वारा उनका निर्माण हुआ है। यानि यहां धर्म और विज्ञान एक ही सिक्के के दो पहलु है.... धर्म आपकी वो आस्था है जो आपने सम्मान के तौर पर उन उपकरणों को दी, जो विज्ञान की सहायता से निर्मित हुये है। विज्ञान और धर्म कई जगह साथ-साथ काम करते है फिर चाहे वो भारतीय संस्कृति हो या फिर पश्चिमी संस्कृति। मान लीजिये किसी मरीज के शरीर का ह्रदय, आंख, किडनी(गुर्दा) काम करना बंद कर दे, तो क्या ये संभव है की, ईश्वर में मात्र आस्था रखने से या फिर दुआ करने से वह स्वस्थ हो जाये। ऐसा कहना किसी मजाक से कम नहीं होगा क्योकि भगवान स्वंय कहते हैं कि “मैं उन्ही की मदद करता हूं जो स्वंय की कोशिशों से खुद की सहायता करते है” और विज्ञान यही काम करता है खुद की सहायता करने का......... जब वैज्ञानिक दिन-रात की मेहनत से लेबोरेटरी में मनुष्य के द्वारा बनाये हुये यानि कृत्रिम ह्रदय, लीवर बनाने के लिये संशोधन या आविष्कार कर रहे होते हैं तब वो पूरी मानव जाति की सहायता का कार्य कर रहे होते है। जब किसी व्यक्ति का ह्रदय कार्य करना बंद कर देता है तो, उसका जीवन उस ह्रदय पर निर्भर करता है, जो कि मनुष्य के अथक प्रयासों द्वारा बनाया गया है और इसके बाद काम शुरु होता है आस्था और विश्वास का... जब डाक्टर और परिजन अपनी कोशिशों के कामयाब होने के लिये   ईश्वर से प्रार्थना करते है और मरीज के स्वस्थ होने पर उसी उपकरण के प्रति धन्यवाद और  आभार व्यक्त करते है, जिससे मरीज के जीवन की रक्षा होती है।




अगर आप और अधिक गौर से इस विषय पर ध्यान देगें तो आपको इस बात का अहसास होगा कि विज्ञान और धर्म दो ऐसी चीजे हैं जो एक-दूसरे के बिना लगभग अधूरी है..... इनकी तुलना करने के स्थान पर यदि आप इन दोनों को पर्याप्त सम्मान देकर अपने जीवन में शामिल करेगें तो भ्रम और दुख से मुक्ति मिलती है। विज्ञान वह बिन्दु है जो आपको कार्य करने का तरीका, उसके पीछे  के रहस्य को जानने के लिये प्रेरित करता है तो धर्म वो बिन्दु है जब आप कार्य समाप्ति के बाद परिणाम को सर्वशक्तिमान पर छोड़ देते है क्योंकि सबकुछ मनुष्य के हाथ में नहीं होता है।