कृष्णा... कान्हा.... कन्हैया.... माखन चोर... और ना जाने ऐसे ही कितने असंख्य नाम श्याम सुंदर... मुरली वाले के हैं.... भारत में भले ही हजारों देवी-देवताओं की पूजा-अराधना की जाती हो लेकिन बंसी वाले की अपनी एक अलग ही आनंदमयी महिमा है.... जितने भिन्न-भिन्न इनके नाम है उतने ही भिन्न-भिन्न इनके स्वरुप भी हैं..... भारतवर्ष में जन्म लेकर उन्होंने इस भूमि को बहुत ही पवित्र तो बनाया ही है.. लेकिन कृष्ण के जीवन से जुड़ी घटना ने प्रत्येक भारतवासी के दिल और दिमाग दोनों को बड़ी ही गहराई से छुआ है। कृष्ण ने अगर कुरुक्षेत्र की भूमि में अर्जुन को अपना विराट स्वरुप दिखाया तो वहीं उनके नटखट स्वभाव को कौन भूल सकता है... वे सुदामा और अर्जुन के प्रति जितने सह्दय रहें.. तो वहीं शत्रु और कपटियों के प्रति उतने ही कठोर भी।


मां के प्रति असीम प्रेम – नटखट कान्हा की शरारतें

“माखन चोर....नटखट कान्हा..... क्यूँ माखन चुराते हो....” मां यशोदा के मुख से ये शब्द तो जैसे ना जाने कन्हैया से कितनी शिकायतें भी करते थे.. तो वहीं उनकी इस नादानी के प्रति मैया के असीम प्रेम को भी दर्शाते थे। मैया कन्हैया से इतना प्रेम करती थी कि एक पल को भी उन्हें अपनी आँखों से ओझल नहीं होने दिया करती थी, तो वहीं कन्हैया भी मैया से अत्यधिक स्नेह करते थे.... और मां की झिड़की खाना तो उन्हे बहुत ही पसंद था.... घर की मटकियां भले ही दूध, माखन, मिश्री, दही से भरी हो.. लेकिन उन्हें असली आनंद तो गोपियों के घर से माखन चुराने में ही आता था....



गोपियों के घर से माखन चुराना – पसंदीदा कार्य

भले ही गोपियां मां के घर कान्हा की शिकायत लगाने आ जाती हो लेकिन फिर भी कान्हा की सेवा में मैया और गोपिया दिन-रात जुटी रहती थी...उनके नहाने से लेकर उनके मनपसंद माखन मिथोने तक सब नन्हें कान्हा की फिक्र में लगे रहते थे...


गऊँ माता के प्रति प्रेम एवं सम्मान -

माता के प्रति जितना प्रेम कृष्ण के ह्रदय में था उतना ही प्रेम वो गऊ माता से भी करते थे... इसी कारण भारतवर्ष में गऊ के दूध को बहुत सम्मान दिया जाता है... गऊ माता के दूध और स्वंय गऊ माता को भी बहुत ही स्नेह और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है.. इसी कारण गऊ माता को मारना और दुत्कारना पाप माना गया है...



राधा के प्रति असीम प्रेम -

कान्हा माता और गोपी को परेशान करने के अलावा राधा को तंग करना कभी नहीं भूलते थे.... राधा और कान्हा का प्रेम अमर है.... कृष्ण और राधा के पांव के धूलकण भी जिस भूमि को छू लेते हैं वहां भूमि का आधार हरा और रंग-बिरंगे फूलों से परिपूर्ण हो उठता है और सुंदर बन जाता है...निराशा और दुख कोसो दूर चले जाते हैं और आसमान पूर्ण रुप से सतरंगी हो जाता है...



शरारती चौकड़ी- ग्वाल-बाल, मुरली और गऊँ माता

कान्हा का मुरली और गऊओं के प्रति असीम प्रेम तो जगजाहिर है.. बांसुरी की सुरीली धुन सुनकर तो गऊएँ अधिक दूध देने लगती थी... ग्वाल-बाल, गांववासी सबकी खुशी का केन्द्र मात्र कान्हा ही थे क्योंकि ईश्वर जहां होगें... वहीं खुशी स्वंय रहती है..


कृष्ण – विश्वास पात्र मित्र एंव शुभचिंतक

कृष्ण जैसे-जैसे बड़े हुए वे अपने शुभचितंको, दोस्तों, प्रिय को मुसीबत से बचाने के लिए सदैव आगे रहे.. मुसलाधार बारिश से गांववालों को बचाने के लिए कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी एक उंगली पर उठा लिया था और तब से अभी तक गोवर्धन पर्वत की पूजा श्रद्धा पूर्वक की जाती है।


गोपियों को प्रति अनंत लगाव -

कान्हा गीता का ज्ञान देते समय जितने गंभीर और विराट रुप में अर्जुन के समक्ष प्रकट हुये थे उतना ही सौम्य और चंचल स्वरुप में वे राधा जी के बंसीवाले थे.... राधा को तंग करना,,उनकी मटकी फोड़ना.. ये सभी श्याम सुंदर के पसंदीदा कार्यों में से एक थे... कान्हा एक प्रेमी के रुप में जितने चंचल रहे... उतने ही धर्म की रक्षा के रुप में कट्टर भी.... कान्हा अपनी बंसी और अपनी ज्ञानशील बातों से राधा और गोपियों को निरंतर प्रेरणा देते रहे... कान्हा के अदृश्य होते ही गोपियाँ बेहाल हो जाया करती थी क्योंकि ये प्रेम पवित्र और सौम्यता के केन्द्र पर आधारित था.. इसमें लेने और देने की भावना नहीं अपितु यह निस्वार्थ था...



सदैव विराजमान रहने वाली मुस्कान -

कान्हा के खिलखिलाने पर पूरा वातावारण स्वंय आनंदित हो जाता था...पवन और अधिक सौम्य और ठंडी हो जाया करती थी... पेड़ और अधिक हरे हो जाया करते थे... वस्त्र और अधिक सुंदर हो जाया करते धे और गोपियों की,,, ग्वाल-बाल.... की मुख आभा, फूल, तितली,,,...समस्त वातावरण की आभा और अधिक मनमोहक और आनंदित हो जाया करती थी..


कुरुक्षेत्र में कृष्ण का विराट एवं रौद्र रुप -

बचपन के कृष्ण का नटखटपन.... बंसीवाले की गोपियों और राधा से साथ की जाने वाली चंचलता... के अतिरिक्त कुरुक्षेत्र की भूमि में कृष्ण का गंभीर और रौद्र रुप कौन भूल सकता है... कृष्ण के बचपन की शैतानियां जहां उनके दिल के चंचल और सौम्य रुप को प्रकट करती है तो वहीं अर्जुन के समक्ष कृष्ण का विराट रुप उनके रौद्र रुप और दृढ़ मस्तिष्क की झलक भक्तों के समक्ष अवगत कराता है... जहां कान्हा की माखन चुराने की बचपन की शरारतों ने पूरे गांववासियों को नाक में दम कर दिया था तो वहीं गीता संदेश ने पूरे विश्व को एक महान संदेश दिया - जीवन जीने का और समस्याओं से निपटने का...। नटखट कान्हा ने पूर्ण रुप से गंभीर भाव के साथ संसार को बताया की कि किस प्रकार बाधाओं में भी जीवन को संयमित रखा जा सकता है और किस प्रकार जीवन की मुस्कान को जीवन की भागदौड़ के बीच खोने ना दे...


कृष्ण-राधा का सुंदर श्रृंगार-

कृष्ण जी के साथ-साथ राधा जी का नाम बहुत ही श्रद्धा और पवित्र भाव के साथ लिया जाता है...कृष्ण और राधा जी का सुंदर श्रृंगार एक असीम आनंद और शांति की ओर मन को प्रेरित करता है.. उनके सौंदर्य के सामने कुछ बोलने का नहीं अपितु बस उनके बारे में सुनने का और शांत रहने का मनोभाव उमड़ आता है....